दोस्तों जैसा कि आप जानते हैं रोजगार के हर क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों का वर्चस्व तोड़ रही हैं खासकर व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त महिलाओं के काम का दायरा बहुत बढ़ा है लेकिन कामयाबी के बावजूद परिवार से जो सहयोग उन्हें मिलना चाहिए वह नहीं मिल रहा है।
आज के दौर में महिलाएं शिक्षा पत्रकारिता, कानून, चिकित्सा या इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवाएं दे रही हैं पुलिस और सेना में भी वे जिम्मेदारी निभा रही रही है पर ज्यादातर महिलाओं को पेशेवर जिम्मेदारियों के साथ ही घर की जि़म्मेदारी भी उठानी पड़ती है जिसका उनके स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता है।
दो नावों पर सवार
बदलते वक्त ने महिलाओं को आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक रूप से सशक्त किया है और उनकी हैसियत एवं सम्मान में वृद्धि हुई है इसके बावजूद अगर कुछ नहीं बदला तो वह है महिलाओं की घरेलू जि़म्मेदारी खाना बनाना और बच्चों की देखभाल अभी भी महिलाओं का ही काम माना जाता है यानी अब महिलाओं को दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है घरेलू महिलाओं की तुलना में कामकाजी महिलाओं पर काम का बोझ ज्यादा है इन महिलाओं को अपने कार्यक्षेत्र और घर दोनों को संभालने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है घर और ऑफिस के बीच सामंजस्य बिठाने में हुई दिक्कत के बाद नौकरी छोड़ने वाली कल्पना कहती हैं 8 घंटे ऑफिस में 3 घंटे ट्रेन-ऑटो में और इसके बाद घर के कामकाज के बीच तालमेल बिठाना मुश्किल होता है।
कारोबारी संगठन एसोचैम द्वारा किए गए एक सर्वे से पता चलता है कि मां बनने के बाद कल्पना की ही तरह कई महिलाएं नौकरी छोड़ देती हैं सर्वे के मुताबिक 40 प्रतिशत महिलाएं अपने बच्चों को पालने के लिए यह फैसला लेती हैं प्रोफेसर अर्चना सिंह कहती हैं कि कामकाजी महिलाओं की स्थिति दो नावों में सवार व्यक्ति के समान होती है क्योंकि एक ओर उसे ऑक्यूपेशनल स्ट्रेस या कामकाज का तनाव झेलना पड़ता है तो दूसरी ओर उसे घरेलू मोर्चे पर भी परिवार को खुश रखने की जिम्मेदारी का निभानी पड़ती है।
अगर आपको हमारी दी गयी जानकारी पसंद आयी तो हमें लाइक और फॉलो जरूर करें और अगर आपका कोई सवाल हैं तो हमें कमेंट बॉक्स में लिखें हम आपके सवाल जा जवाब जरूर देंगे।

0 Comments
Please do not enter any spam link in the comment box.